Friday, July 20, 2012

दिल पत्थर शीशा

और कितना है समझाना तुझे
कितना होगा मनाना तुझे!
दिल दिल कहाँ रहा! पत्थर हो चुका
इतना प्रयास लगा है सनम 
तुझे हर पल रिझाने में मुझे

और अब कितना है रुलाना मुझे 
कितना और तडपाना मुझे!
दिल दिल कहाँ रहा! शीशा हो चुका 
चुभते ही रहते टुकड़े शत-शत  
तेरी हर बात भुलाने में मुझे 

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विकास प्रताप सिंह 'हितैषी'
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